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डॉक्टर की गैरमौजूदगी में ‘इलाज’ कौन कर रहा? सिंह क्लिनिक पर उठे गंभीर सवाल!

कम्पाउंडर खुद को बता रहा फार्मासिस्ट, मरीजों के इलाज का आरोप; क्लिनिक में डायग्नोस्टिक सेंटर भी संचालित होने की चर्चा, लैब टेक्नीशियन की मौजूदगी पर भी सवाल

कोरिया। जिले में निजी स्वास्थ्य संस्थानों की व्यवस्था और उनकी निगरानी को लेकर एक बार फिर गंभीर सवाल खड़े हो रहे हैं। बछरापोडी स्थित सिंह क्लिनिक के संचालक डॉ. जितेंद्र सिंह की गैरमौजूदगी में कथित तौर पर उनके कम्पाउंडर द्वारा मरीजों का इलाज किए जाने की बात सामने आई है। इससे सबसे बड़ा सवाल यह है कि आखिर किसी चिकित्सक की अनुपस्थिति में मरीजों की जांच, बीमारी का आकलन और उपचार करने का अधिकार संबंधित व्यक्ति को किस नियम के तहत प्राप्त है?

बताया जा रहा है कि क्लिनिक में कार्यरत व्यक्ति स्वयं को फार्मासिस्ट बताता है, लेकिन सवाल यह है कि फार्मासिस्ट की योग्यता और पंजीयन होने मात्र से क्या मरीजों का चिकित्सकीय निदान और उपचार किया जा सकता है? यदि ऐसा हो रहा है तो इसकी वैधानिक अनुमति किसके द्वारा और किन नियमों के तहत दी गई है?

डॉक्टर बोले—सब नियम से चल रहा है, फिर नियम आखिर है क्या?

इस मामले में जब डॉ. जितेंद्र सिंह से सवाल किया गया, तो उनका कहना बताया गया कि उनके क्लिनिक में सब कुछ नियम के अनुसार संचालित हो रहा है।

लेकिन यहीं से असली सवाल खड़ा होता है—

अगर सब कुछ नियम से चल रहा है तो डॉक्टर की अनुपस्थिति में मरीजों का उपचार करने वाले व्यक्ति की वैधानिक भूमिका क्या है?

क्या वह केवल डॉक्टर की सहायता करने वाला कम्पाउंडर है या उसके पास मरीजों के चिकित्सकीय परीक्षण एवं उपचार के लिए आवश्यक वैधानिक योग्यता और पंजीयन है?

स्वास्थ्य विभाग को इसका जवाब देना चाहिए।

क्लिनिक के भीतर डायग्नोस्टिक सेंटर भी?

मामला यहीं खत्म नहीं होता। जानकारी के अनुसार सिंह क्लिनिक परिसर में ही डायग्नोस्टिक सेंटर के माध्यम से खून और पेशाब की जांच भी किए जाने की बात सामने आ रही है।

सबसे गंभीर सवाल यह है कि क्या यहां निर्धारित योग्यता वाला लैब टेक्नीशियन मौजूद है?

स्थानीय स्तर पर ऐसी चर्चा है कि यहां नियमित रूप से लैब टेक्नीशियन की मौजूदगी नहीं है और कथित तौर पर अनुभव के आधार पर ही जांच का काम किए जाने की बात सामने आ रही है।

यदि यह दावा सही है तो मरीजों की जांच रिपोर्ट की विश्वसनीयता से लेकर उनकी आगे की चिकित्सा तक पर सवाल खड़े होना स्वाभाविक है।

रिपोर्ट गलत हुई तो जिम्मेदार कौन?

खून या पेशाब की जांच महज मशीन चलाने का काम नहीं है। जांच के परिणाम के आधार पर डॉक्टर मरीज की बीमारी का आकलन और आगे का उपचार तय करते हैं।

ऐसे में सवाल सीधा है—

अगर बिना निर्धारित योग्यता वाले व्यक्ति से जांच कराई जा रही है और रिपोर्ट के आधार पर मरीज का इलाज हो रहा है, तो किसी गलती की स्थिति में उसकी जिम्मेदारी कौन लेगा?

विभाग की नजर के सामने सब कुछ?

सबसे बड़ा सवाल अब मुख्य चिकित्सा एवं स्वास्थ्य अधिकारी कार्यालय की निगरानी व्यवस्था पर भी उठ रहा है।

यदि सिंह क्लिनिक में चिकित्सक की गैरमौजूदगी में कथित रूप से मरीजों का उपचार हो रहा है और उसी परिसर में डायग्नोस्टिक जांच भी संचालित की जा रही है, तो क्या स्वास्थ्य विभाग ने कभी इसका निरीक्षण किया?

क्या क्लिनिक का पंजीयन और लाइसेंस वैध है?

क्या वहां कार्यरत सभी स्वास्थ्यकर्मियों की योग्यता एवं पंजीयन का सत्यापन किया गया है?

क्या डायग्नोस्टिक सेवा के लिए निर्धारित मानव संसाधन और तकनीकी मानकों का पालन हो रहा है?

और सबसे अहम—

क्या सिंह क्लिनिक को विभाग से ऐसी कोई विशेष छूट मिली है?

अगर नहीं, तो फिर विभागीय जांच कब होगी?

और अगर हां, तो वह छूट किस नियम के तहत दी गई है?

इन सवालों का जवाब मरीजों के हित में सामने आना जरूरी है।

अब स्वास्थ्य विभाग की परीक्षा

छत्तीसगढ़ में क्लिनिकल एस्टैब्लिशमेंट के संचालन के लिए लाइसेंसिंग और निर्धारित मानकों का प्रावधान है।

ऐसे में स्वास्थ्य विभाग से मांग है कि सिंह क्लिनिक का तत्काल निरीक्षण कराया जाए, वहां कार्यरत चिकित्सक, फार्मासिस्ट/कम्पाउंडर एवं लैब स्टाफ की योग्यता-पंजीयन की जांच की जाए तथा डायग्नोस्टिक सेंटर के संचालन से संबंधित दस्तावेजों और अनुमति की भी जांच की जाए।

क्योंकि सवाल सिर्फ एक क्लिनिक का नहीं है—सवाल उन मरीजों की जिंदगी का है, जो इलाज के भरोसे डॉक्टर के पास पहुंचते हैं।

अब देखना यह है कि स्वास्थ्य विभाग इन गंभीर सवालों पर जांच करता है या फिर मामला फाइलों में ही दबा रह जाता है?

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